उम्र के अनुसार निदान कैसे करें? (How to Diagnose as per Age Factor)
निदान कैसे करें?(How to Diagnose the Disease?)
(1) उम्र के अनुसार निदान (Diagnosis as per Age Factor)
(2) माँसपेशीय निदान (Muscles Diagnosis)
(3) समय के आधार पर निदान (Time Diagnosis)
(4) मौसम के आधार पर निदान (Seasonal Diagnosis)
(5) यिन-यांग के सिद्धान्त के आधार पर निदान (Diagnosis on Yin-Yang Principle Basis)
(6) शरीर तंत्र के आधार पर निदान (Diagnosis as per Body System)
(7) चेहरे के आधार पर निदान (Face Diagnosis)
(8) रंगों द्वारा निदान (Diagnose by Colour)
(9) सूँघकर निदान (Diagnose by Smell)
(10) स्वाद के आधार पर निदान (Diagnose by Taste)
(11) आवाज के आधार पर निदान (Diagnose by Sound)
(12) आँखों को देखकर निदान (Functional Eye Diagnose)
(13) हाथों की जाँच करके निदान (Diagnose by Hand)
(14) शरीर संरचना को देखकर निदान (Diagnose by Observation of Body Constitution)
(15) जीभ देखकर निदान (Diagnose by Tongue)
1. उम्र के अनुसार निदान (Diagnose as per Age Factor)
मानव जीवन की अवस्थाओं को सिक्स-की की तरह छः भागों में बाँटा जा सकता है। जीवन की प्रत्येक अवस्था एक सिक्स-की अर्थात एक ऊर्जा से सम्बन्धित होती है। सम्पूर्ण जीवन की अवधि के विभाजित काल में एक ऊर्जा विशेष आधिक्य रूप में मौजूद रहती है (One Dominating Energy) जो उस काल विशेष को प्रभावित करती है।
(i) प्रथम अवस्था 1 से 10 वर्ष
यह अवस्था वायु ऊर्जा की है, इसमें शरीर में वायु ऊर्जा अधिक होती है। यह काल बाल्यकाल कहलाता है। यदि हम एक से दस वर्ष के बच्चों की दिनचर्या पर गौर करें तो हमें ज्ञात होगा कि उनके शरीर में वायु ऊर्जा अधिक होने के कारण वे एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते हैं, वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर तेजी से भागते दौड़ते रहते हैं। उनका एक स्थान पर अधिक समय तक टिके (स्थिर) रहना बड़ा मुश्किल होता है। उनका मूड भी ज्यादा समय तक एक-सा नहीं रहता है, गुस्से का दौर भी सभी बच्चों में समान-सा ही रहता है। बच्चे ऊँची आवाज में बोलने वाले हल्ला करने वाले तथा उनमें हर चीज को जानने की जिज्ञासा रहती है। यह सब वायु ऊर्जा की अधिकता ही प्रभाव है।
1 वर्ष से 10 वर्ष तक के बच्चों में वायु ऊर्जा का बाहुल्य रहता है। इसी कारण बच्चे लगातार घूमते रहते हैं, एक जगह पर बैठ नहीं सकते, हमेशा क्रियाशील (Active) रहते हैं परन्तु यदि बच्चा एक जगह पर बैठा रहता है तो यह समझना चाहिए कि उसमें वायु ऊर्जा की कमी है। यदि बच्चा ज्यादा चंचल है तो ऐसे में उसकी वायु ऊर्जा बहुत अधिक है ऐसे में हमें उसकी यिन वायु ऊर्जा को कम करना चाहिए इससे अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे।
(ii) द्वितीय अवस्था 11 से 20 वर्ष तक
यह अवस्था ऐसी होती है जिसमें शरीर में हीट ऊर्जा (Heat Energy) अधिक होती है। किशोरावस्था या उठती जवानी की उम्र में हीट ऊर्जा का आधिक्य रहता है। वे हँसने और बात करने की पूर्ण चेष्टा करते हैं। उनमें भविष्य के प्रति बहुत-सी अपेक्षाएँ होती हैं। उनमें बहुत सी काल्पनिक इच्छाएँ होती हैं।
(iii) तीसरी अवस्था 21 से 30 वर्ष तक
इस अवस्था में शरीर में हॉटनेस ऊर्जा (Hotness Energy) का आधिक्य होता है। इस अवस्था में मनुष्य का शरीर पूर्ण विकसित हो जाता है तथा परिपक्वता आ जाती है। शरीर के सभी अंग पूर्ण विकसित हो जाते हैं, उनमे भावनात्मक क्षमता वैचारिक क्षमता निकलकर सामने आती है। यह काल इच्छाओं को वास्तविकता में परिणत करता है और मनुष्य प्रसन्नता और सद्भावपूर्ण, शांतिमय जीवन की ओर अग्रसर होता है। इस काल में मनुष्य के शरीर में वृद्धि होती है तथा चर्बी बढ़ती है।
(iv) चौथी अवस्था 31 से 40 वर्ष तक
इस अवस्था में शरीर में आर्द्रता ऊर्जा (Humidity Energy) का आधिक्य होता है। इस काल में गति करने प्रवृत्ति कम होती है, शरीर का चयापचय (Metabolism) घटने लगता है तथा शरीर का वजन बढ़ता है। इस काल व्यक्ति कठिन परिश्रम करता है लेकिन उसे अपने बच्चों, मित्रों व जिनसे वह प्रेम-स्नेह करता है उनकी चिंता रहती है तार्किक स्तर पर वैचारिक शक्ति बढ़ती है तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है।
(v) पांचवी अवस्था 41 से 50 वर्ष तक
इस काल में शुष्क ऊर्जा (Dryness Energy) का आधिक्य होता है। शरीर में हार्मोन्स के परिवर्तन के कारण टिश्युज (Tissues) में परिवर्तन आता है और शरीर में पानी को धारण करने अथवा रोकने की क्षमता कम हो जाती व वजन कम होने लगता है। शरीर की त्वचा रूखी होने लगती है तथा सिलवटें (Wrinkles) नजर आने लगते हैं। शरीर की कार्य प्रणाली में गिरावट व क्षीणता आने लगती है। जब मनुष्य की इच्छाएँ तथा उद्देश्य पिछले समय में पूरे हो जाते हैं तो उसमें उदासीनता की हल्की झलक दिखाई देती है और वह अपने अच्छे समय का ध्यान करता है जब उसमें पूर्ण ऊर्जा एवं अनन्त इच्छाएँ थीं। यदि इच्छाएँ एवं उद्देश्य लम्बे समय तक पूरे नहीं होते तो व्यक्ति डिप्रेशन में चला जाता है।
यहाँ पर यदि हम लकवे (Paralysis) का उदाहरण लें तो यह ठंडक (Coldness) की बीमारी है। यदि किसी 41 वर्ष से 50 वर्ष तक के व्यक्ति के लकवा होता है तो उम्र के आधार पर यह समय यिन शुष्कता का है। यिन शुष्कता (Dryness) यिन वायु (Wind) ऊर्जा को कम करती है व यिन यांग के सिद्धान्त के अनुसार अधिक हो जाती है तो यांग आर्द्रता को कम करती है। यदि यांग आर्द्रता (Humidity) कम होती है तो (Coldness) को कम नहीं करती, इस प्रकार यांग ठंडक (Coldness) लकवे का कारण बनती है।
(vi) छठी अवस्था 51 से 60 वर्ष तक
इस काल से शरीर में ठंडक ऊर्जा (Coldness Energy) का आधिक्य होने लगता है। ठण्डक ऊर्जा बुद्धिमता को बढ़ाती है, बुजुर्ग व्यक्ति अधिक चौकन्ना तथा सुविचारित हो जाते हैं। इच्छाएँ कम हो जाती हैं तथा मृत्यु का डर उत्पन्न होने लगता है। इस काल में शारीरिक शक्ति का हास होने लगता है। जब तक मनुष्य जीवित रहता है तब तक वह ठंडक ऊर्जा से घिरा रहता है। शरीर का तापमान कम होने लगता है तथा ठंडक (Coldness) की बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं जैसे पथरी, हृदयाघात (Stroke), कैंसर, संक्रमण (Infection) आदि होने का डर रहता है।
इसी प्रकार 51 से 60 वर्ष की उम्र में मरीज हृदय सम्बन्धी दर्द, बीमारी से ग्रस्त हो सकता है क्योंकि इस ग्रुप में शरीर में हीट की कमी हो जाती है और हृदय की हीट कम होने से हृदय की बीमारी होने की सम्भावना रहती हैं।
वैसे उम्र के समूह के अनुसार ऊपर दिया गया जीवन चक्र लचीला (Flexible) है। यह देश, काल, धर्म जाति व परिस्थितियों के अनुसार अलग भी हो सकता है।





Comments
Post a Comment